Ban the Book

किताबों के प्रकाशक पेंगुइन ने एक किताब को फिर से लुगदी में तब्दील करने का फैसला लिया है क्योंकि शिक्षा बचाओ आंदोलन चलाने वाले दीनानाथ बत्रा साहेब की भावनाएं आहत हो गईं। पेंगुइन भारत में नहीं पाया जाता पर विज्ञान की किताबों में लिखा है कि उस स्तनपायी पक्षी की पीठ में रीढ़ होती है। किताब प्रकाशित करने वाले पेंगुइन की रीढ़ के अस्तित्व पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है। शिक्षा बचाओ आन्दोलन वाले किताब जला नहीं रहे थे, प्रदर्शन या बंद पर उतारू नहीं थे। बत्रा साहेब ने तो कानूनी राह पकड़ी। किताब के खिलाफ अदालत चले गए और प्रकाशक ने कानूनी पचड़े में पड़ने की बजाय किताब को कचरे में डालना ही बेहतर समझा। किताब की लेखिका शिकागो की शिक्षिका वेंडी डोनिजर बहुत दुखी और क्रोधित हैं कि एक आजाद मुल्क में किताब पर खुदबखुद प्रतिबंध लग गया, इतनी आसानी से। बिना अदालत के हस्तक्षेप के। कुछ हास्यास्पद त्रुटियों वाली ये किताब काफी दिनों से बिक रही थी और  बहुतों ने पढ़ी। ज्यादातर लोगों की भावनाएं बत्रा साहेब की भावनाओं की तरह भुरभुरी नहीं थी कि एक किताब के शब्दों से आहत हो जाएं। बत्रा साहब की मानें तो सभी हिंदुओं की भावनाएं आहत थीं। उनके मुताबिक़ किताब हिन्दुओं के बारे में गलत अवधारणाएं बनाता है। अब चूँकि भारत में बिकेगी नहीं तो हिन्दू लोग अपने बारे में अच्छी अवधारणा रखेंगे। बाहर के लोग हमारे बारे में गलत अवधारणा बनाते रहें। क्योंकि किताब की बिक्री पांच हज़ार गुना बढ़ गई है। जब जब आपकी भावनाएं आहत होती हैं, किताब और मशहूर होती है। उसे ज्यादा लोग पढ़ते हैं।

बांगलादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के भारत में रहने से ही कई लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं। सलमान रुश्दी को तो अपने मुल्क भारत आना दूभर है। नसरीन और रुश्दी से इस्लाम को खतरा है। शिवाजी पर तो किताबें लिखना मुश्किल हो गया है क्योंकि पता नहीं कब ठाकरे बंधुओं की भावनाएं आहत हो जाएं। धर्म पर प्रश्न नहीं उठाएंगे। हालांकि धर्म के मूल में ही प्रश्न है। अर्जुन ने सीधे भगवान से इतने प्रश्न किए कि गीता जैसा ग्रंथ बन गया। अभी प्रश्नों पर पाबंदी है, पता नहीं किसकी भावना कब आहत हो जाए।

जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे। ये डर संविधान निर्माताओं को भी था इसलिए उन्होंने हर नागरिक को बोलने-लिखने-पढ़ने की आजादी का मौलिक अधिकार दिया। यह नागरिक अधिकार है। समूह का नहीं ताकि नागरिक समूह से डरे नहीं। भीड़ किसी अकेले पर भारी नहीं पड़े। जो संख्या में ज्यादा हैं उनका अधिकार किसी से ज्यादा ना हो। पर हमने इस मूल अधिकार का वही हाल किया जो धर्मनिरपेक्षता का। मतलब ही बदल दिया। अब भीड़ चाहे तो कुछ भी करवा सकती है। दस आदमी मिलकर सड़क जाम कर सकते हैं तो चार आदमी मिलकर किताबें भी बैन करवा सकती हैं। सरकार भीड़ के अधिकार को तवज्जो देती है। संविधान की अवधारणा धरी रह जाती है जब किताबें जला दी जाती हैं। रुश्दी ने कहा था अगर किसी किताब से आपकी भावनाएं आहत हों तो इसका सबसे बढ़िया तरीका है उसे नहीं पढ़ें। हमारा तरीका है किसी को ना पढ़ने दें। गांधी तो गांधी, सोनिया गांधी तक पर भी उंगली उठाए तो किताब नहीं बिकने देंगे।

हम इतनी सदियों से बेड़ियों में रहे कि आजादी का पूरा मतलब नहीं समझते। प्रतिबंध तुरंत समझ जाते हैं। अपने हाथ में हथकड़ी हमको गहना लगता है. क्योंकि जब जब किसी आज़ाद नागरिक की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बंधन लगता है, वह बंधन आप पर भी लगता है. किताबें, फिल्में या अखबार, सब इसी आज़ादी के रास्ते हैं. जिसपर बाड़ लगें तो आपकी ही राह मुश्किल होगी. लोग कहते हैं कि संविधान हमको अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, निंदा करने का अधिकार नहीं देता. वह यह भूल जाते हैं कि यह अधिकार बुरा बोलने की आज़ादी निश्चित करता है. अच्छा बोलने के लिए किसी अधिकार की ज़रूरत नहीं है. मैं आपकी प्रशंसा करूंगा तो आप मुझपर हमला नहीं करेंगे. मीठा मीठा ही बोलना होता तो फिर अधिकार बनाने की आवश्यकता क्या थी.  ये स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब है जो तुमको हो नापसंद वह भी बात करेंगे.

सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा पर कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. वह बात यही है कि हमने धर्म की रक्षा करने की कोशिश नहीं की. क्योंकि जिसका नाम सनातन हो, वह दिया इतना कमज़ोर तो नहीं होगा कि हवा चली और बुझ जाए. खिड़की खोलिए, ताज़ी हवा आने दीजिए. हर दिशा से अलग खुश्बू लिए. चिराग हवा से ही जलते हैं. धर्मों की व्याख्या का अधिकार सब को है. जो इस से चिढ़ते हैं, वह धर्म को नहीं बचाते. धर्म को उनसे बचने की ज़रुरत है. वेलेंटाइन डे को संस्कृति बचाने निकलते हैं. प्यार के खिलाफ हिंसा कौन सी संस्कृति है? दामन हटाइए. चिराग को रौशनी फैलाने दीजिए.

क्या खबर उनको कि दामन भी सुलग उठते हैं,
जो ज़माने की निगाहों से बचाते हैं चिराग!!

नौ दो ग्यारह सिलिंडर

ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब सरकार ने हमको समझाया कि सब्सिडी का ज़हर सर्वनाश कर देगा. वीरप्पा मोइली ने देश को बताया कि गैस सिलिंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी से तेल कंपनियों को इतना घाटा हो रहा है कि ये अनमोल रतन कंपनियां बेमोल मारी जाएंगीं. महंगाई से त्रस्त देश से कहा गया देश के लिए थोड़ा बोझ आप भी उठाइए. सस्ते में सिर्फ नौ सिलिंडर मिलेंगे. लॉजिक भी यही कहता है, जितने की खरीद है उससे कम दाम में अगर बेचेंगे तो तेल कंपनियों की लुटिया डूब जाएगी. वो तेल कंपनियां भी सरकारी हैं तो अंत में जनता को ही नुकसान होगा. अर्थव्यवस्था मजबूत रहेगी तो सरकार कल्याणकारी योजनाओं पर पैसा खर्च कर पाएगी तो जनता का ही कल्याण होगा. इसलिए जनता मनमसोस कर, किचन में कटौती कर, तैयार हो गई कि देश बलिदान मांगता है तो देंगे. थोड़े विरोध के बाद जब देश मान गया तो वीरप्पा मोइली की जान में जान आई. प्रधानमंत्री गदगद हो गए कि कितना मैच्योर हो गया है ये देश. चोट पर चोट पड़ रही है, आह करता है पर शिकवा नहीं करता.

फिर कांग्रेस से मांग उठी कि राहुल बाबा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए. इतना बड़ा रिस्क पार्टी लेने के मूड में नहीं थी तो कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को तोहफे में राहुल बाबा ने एलान किया कि तीन सिलिंडर और दिए जाएं. प्रधानमंत्री वहीं बैठे थे और वीरप्पा मोइली भी. जो उन्होंने देश को समझाया था वह राहुल जी को नहीं समझाया. बस उनका हुकुम बजाया. कल ही समाचार आया कि सब्सिडी के सिलिंडर बारह होंगे. इस खबर से ख़ुशी की लहर हमारे दिल में भी दौड़ी पर एक बात नहीं बुझाया. अगर देश संकट में था तो क्या वो संकट राहुलजी के एक बयान से ख़त्म हो गया. अगर नहीं था तो मोइली जी हमको झूठ बोलकर लूट रहे थे. दोनों तो सच हो नहीं सकते. अगर इसमें झूठ बोले तो और कितने मामलों में झूठ बोल चुके हैं. क्या डीजल और पेट्रोल के भाव में भी कोई फाव खा रहा है? और अगर पेट्रोलियम कंपनियां सचमुच दिवालिएपन की कगार पर हैं तो फिर ये दिमागी दिवालियापन नहीं तो और क्या है कि आप तेल बेचने वालों को कुएं में धकेल रहे हैं. अगर दीवानापन नहीं है तो मामला वोट के लिए ईमान बेच देने का है.

आंकड़ों में ना जाएं. आंकड़े दोनों तरफ से आते हैं. तेल कंपनियों के आंकड़े बताते हैं कि दाम नहीं बढ़ाया तो बर्बादी तय है इसलिए वीर तुम बढ़े चलो. दूसरी तरफ वे हैं जो कहते हैं ज़रा ठहरो. ये सब जो अनगिनत टैक्स हैं, ये दाम के साथ बढ़ते हैं. फ़र्ज़ कीजिए दस परसेंट का सेल टैक्स है. जब ४० रूपए तेल था तो सरकार चार रूपए टैक्स लेती थी और हम ४४ देते थे. तेल जब ८० का हुआ तो हम ८८ देते हैं जिसमें से आठ सरकार लेती है. तेल कम्पनियाँ तथाकथित तौर पर घाटा पूरा कर रही होती हैंऔर फोकट में सरकार की आमदनी दुगुनी हो जाती है. ये तो मुनाफाखोरी है. ये सिर्फ एक टैक्स का उदाहरण भर है. टैक्स और भी हैं. अगर सरकार का दिल जनता के लिए इतना पसीजता है तो वे टैक्स कम ना करें पर दाम के साथ दुगुना तो नहीं करें. पर वे करती हैं. हमको अर्थव्यवस्था का हवाला देती हैं. हम जिम्मेदार नागरिक की तरह ये ज़िम्मेदारी सर पर उठाते हैं पर दर्द-ए-सर तब असर करता है जब ये खुले आम वोट के लिए हम पर चोट करते हैं. जो गैस पर की सब्सिडी के मामले में उजागर होता है.

ये घटने का घटिया मजाक मोइली को मुबारक. क्योंकि इससे साबित होता है जब दाम बढ़े थे तब मज़ाक हुआ था, या अब हुआ है. मजाक महंगा पड़ सकता है. उनको भी जो करते हैं. उनको भी जो ठठाते हैं. क्योंकि खून-पसीने की कमाई पर हँसना ठीक नहीं. राज ठाकरे टोल टैक्स का खुलेआम विरोध क्यों नहीं करें जब ये पता ही नहीं कि वो सचमुच सेवा का कर है या फिर मजाक भर है. सरकार किसी की तनख्वाह से जब टैक्स लेती है तो बहाना होता है कि आखिर उसी से देश में सड़कें आदि बनती हैं. फिर जब वह गाड़ी खरीदता है तो उस से रोड टैक्स लेती है. फिर जब वह गाड़ी रोड पर ले जाता है तो टोल टैक्स लेती है. वह आदमी देते वक़्त सोचता है कि आखिर मेरे कौन से टैक्स से सड़क बनती है. क्योंकि ये पूरा सिस्टम इतना धुंधला है जितना घने कोहरे में सड़क. कोहरे में दुर्घटना की सम्भावना बनी रहती है. टोल टैक्स का बूथ भी चपेट में आ सकता है. जैसे महाराष्ट्र में आ रहा है. सिलिंडर नौ से बारह कर कांग्रेस को अपने पौ बारह होने की उम्मीद है पर सारे संकेत बता रहे हैं कि उन्हें नौ दो ग्यारह करवाने की तैयारी है. अगली सरकार जो भी आए उन्हें टैक्स की पूरी व्यवस्था पर विचार करना होगा. क्योंकि भद्दे मजाकों की ये श्रृंखला टूटने वाली है आम आदमी के सब्र के बाँध के साथ.

Kites

गुजरात में मकर संक्रांति को उत्तरायण कहते हैं. सूर्य इस दिन उत्तर की ओर चल पड़ता है, दिन रात से लम्बे होने का अभियान आरंभ करता है। लोग पतंग उड़ाते हैं और आसमान पतंगों से भर जाता है। इस बार भी उत्तरायण में वही सब हुआ पर रंग थोड़ा राजनीतिक है मौसम की तरह। चुनावी वसंत पांच साल की ठिठुरन झाड़ कर धमका है। पूरे देश में पतंगबाजी शबाब पर है। अंग्रेजी में पतंगबाजी या काइट-फ्लाइंग थोड़ा निगेटव माने रखता है। गुजरात के अगुआ पर अंग्रेजी वाली पतंगबाजी का आरोप है। थोड़े हौले उड़ रहे हैं आजकल। 

पतंगबाजी बहुत रोचक हो जाता है जब एक-दूसरे की पतंग काटने की होड़ हो। जब चाइनीज पतंग मार्केट में नए आए थे तो पुराने पतंगबाजों के सामने बड़ी मुसीबत आ गई थी। कागज की जगह प्लास्टिक की पतंग जिसकी डोर काटे न कटे। जब तनिक अंदाजा आया तो वह भी कटने लगे पर शुरू में बहुत किचाहिन किया। इस बार भी मार्केट में नया पतंग आया है। आप पतंग। जनता भी इनको खूब ढील दे रही है। दिल्ली वालों ने जब इस नए पतंग को यमुना तीरे उड़ाया, तब से इसके हौसले आसमान में हैं। पेंच पर पेंच। खेंच पर खेंच। दिखते अनाड़ी हैं पर मांजा मंजा हुआ है।

एक युवा पतंगबाज हैं जो दस सालों से प्रैक्टिस में लगे हैं। इस बार लोग उनको छत पर धकेल रहे हैं कि चढ़ जा बेटा, उड़ा ले अपनी भी। पतंग लट्टू है, पर फिरकी फिराने में सिर फिर रहा है। ऊपर से ये जहां खड़े हैं, वहां हवा भी उल्टी चल रही है। पतंग उड़ने में हवा का बड़ा महत्त्वपूर्ण रोल होता है। अनुकूल हवा में बूढ़े भी अपनी उड़ा ले गए थे। अब हवा अनुकूल नहीं है तो युवा की हवा निकल रही है। 

जब पतंग हवामान हो तो आदमी ढील देता जाता है। खेंच का खयाल तक नहीं आता है। पर हवा के साथ समस्या यही है। ये दिखती नहीं। पता नहीं चलता कब पलट जाए और पतंग हिचकोले लेने लगे। हर पतंग को ढील चाहिए उड़ने के लिए पर खेंच भी जरूरी है, नहीं तो पेंच में कटने का खतरा रहता है।